...तो यह है अंडे का फंडा

कभी भारत को सोने की चिड़िया अौर दूध-दही की नदियां बहने वाला देश कहा जाता था। अत्यंत समृद्ध अौर पोषण की कमी न होने वाला वह जमाना गया। अब ज्यादातर लोगों को दो वक्त की रोटी ठीक से नसीब हो जाए तो उसे वह अपनी किस्मत मानते हैं। ऐसे में खाने में पौष्टिक तत्वों की कौन सोचे? नतीजा यह कि देश में कुपोषण तेजी से बढ़ रहा है। खास तौर पर बच्चों में, जो देश का भविष्य हैं। यह समस्या कैसे खत्म हो? शायद अंडे का फंडा काम अाए। ऐसा मानना है डा. मनोज शुक्ला का। 

डा. शुक्ला ने यह मुहिम शुरू की है कि जिन राज्यों में स्कूलों के मध्यान्ह भोजन (मिड डे मिल) में अंडा शामिल नहीं है उन्हें अौर साथ ही केंद्र सरकार को तुरंत कदम उठाकर अंडे को शामिल करना चाहिए। बकौल डा. शुक्ला, 'अंडा उच्च पोषक गुणवत्ता युक्त,सस्ता एवं सहज उपलब्ध पोषक आहार है। माँ के दूध के बाद अंडा ही प्रोटीन का सबसे बड़ा स्त्रोत है।' उनका कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) एवं इंटरनेशनल एग काउंसिल (IEC) ने भी अंडे को कुपोषण से लड़ने का सबसे सशक्त माध्यम माना है। 

Change.org पर उठाए गए अपने अॉनलाइन मुद्दे में डा. शुक्ला ने यह तर्क भी दिया है कि 'कई राज्यों, मसलन आंध्र प्रदेश,तमिलनाडु,केरल,कर्नाटक,उड़ीसा इत्यादि में आंगनबाड़ी और प्राथमिक शालाओं के मध्यान्ह भोजन में प्रति सप्ताह, प्रति छात्र/छात्रा 3-5 अंडे दिए जाते हैं जिसके कारण वहां बच्चों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। जबकि छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र,गुजरात इत्यादि प्रदेशों में मध्यान्ह भोजन में अंडा नहीं दिया जाता है इस कारण इन प्रदेशों में अब "अतिकुपोषित बच्चों" की स्थिति निर्मित हो रही है।' 

अंडे के इस फंडे से अाप सहमत हैं तो नीचे लाल रंग के बटन पर क्लिक कर अपना हस्ताक्षर कर सकते हैं।